पारिस्थितिकी तंत्र किसे कहते हैं, इसकी विशेषताएं, घटक और प्रकार क्या हैं

Sandeep
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पारिस्थितिकी वह विज्ञान है. जिसके अन्तर्गत समस्त जीवों तथा भौतिक पर्यावरण के मध्य उनके अन्तर्संबंधों का अध्ययन किया जाता है.

वर्तमान में, पारिस्थितिकी की अवधारणा को न केवल पौधों, जन्तुओं और उनके पर्यावरण के बीच के अंतर्संबंधों के अध्ययन को शामिल करने के लिए विस्तृत किया गया है, बल्कि मनुष्यों, समाज और उसके भौतिक पर्यावरण की अंतःक्रियाओं का भी अध्ययन किया जाता है.


पारिस्थितिकी तंत्र किसे कहते हैं (what is ecosystem in Hindi)

सामान्य तौर पर, जीवमंडल के सभी घटकों का समूह जो एक अंतःक्रिया में शामिल होता है, पारिस्थितिकी तंत्र कहलाता है. पारिस्थितिकी तंत्र प्रकृति की एक कार्यात्मक इकाई है. जिसमें इसके जैविक और अजैविक घटकों के बीच जटिल अंतःक्रियाएं शामिल हैं.

पारिस्थितिक तंत्र एक ऐसी इकाई है जिसके भीतर सभी जैविक समुदाय एक निर्दिष्ट क्षेत्र के भीतर एक साथ कार्य करते हैं. और भौतिक पर्यावरण (अजैविक घटकों) के साथ इस तरह से परस्पर क्रिया करते हैं कि ऊर्जा स्पष्ट रूप से परिभाषित जैविक संरचनाओं के भीतर प्रवाहित होती है. और जिसमें विभिन्न तत्व सजीव तथा निर्जीव अंशों में चक्रण होता रहता है.

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पारिस्थितिक तंत्र की परिभाषा

पारिस्थितिक तंत्र प्रकृति का एक भाग है जिसमें जीवित प्राणियों का समुदाय और भौतिक पर्यावरण शामिल होते हैं, इन दोनों घटकों के बीच ऊर्जा, पोषक तत्वों और अन्य पदार्थों का निरंतर आदान-प्रदान होता रहता है.

पारिस्थितिकी तंत्र की विशेषताएं

• पारिस्थितिकी तंत्र एक संरचित और सुसंगठित तंत्र होता है.

• पारिस्थितिकी तंत्र प्राकृतिक संसाधन तंत्र होते हैं अर्थात् यह प्राकृतिक संसाधनों का प्रतिनिधित्व करता है.

• पारिस्थितिकी तंत्र की उत्पादकता उसमें ऊर्जा की सुलभता पर निर्भर करती है.

• पारिस्थितिकी तंत्र के विभिन्न प्रकार ऊर्जा द्वारा संचालित होते हैं.

• पारिस्थितिकी तंत्र एक खुला तंत्र है. जिसमें पदार्थों और ऊर्जा का निरंतर निवेश तथा बहिर्गमन होता है.


आकार के आधार पर इसे अनेक भागों में बाँटा जा सकता है.

पारिस्थितिकीय कर्मता

पारिस्थितिकीय कर्मता अपने पर्यावरण में किसी विशेष प्रजाति की कार्यात्मक भूमिका और स्थिति को संदर्भित करता है. इसमें प्रजातियों द्वारा उपयोग किए जाने वाले संसाधनों की प्रकृति, उनका उपयोग करने का तरीका, उस प्रजाति की अन्य प्रजातियों के साथ समय और अंतःक्रियाएं भी शामिल हैं.


पारिस्थितिकीय तंत्र की स्थिरता पारिस्थितिकीय निकेत की विविधता पर निर्भर करती है. पारिस्थितिकीय निकेत की विविधता जितनी अधिक होगी पारिस्थितिकी तंत्र की स्थिरता भी उतनी ही अधिक होगी क्योंकि उस पारिस्थितिकी तंत्र में ऊर्जा का प्रवाह अधिक होगा और 'खाद्य-श्रृंखला' बड़ी होगी.

जिससे प्रजातियों की संख्या में उतार-चढ़ाव कम होगा. कम प्रभावी प्रजातियों की तुलना में अधिक प्रभावी प्रजातियों का पारिस्थितिकीय निकेत अधिक विस्तृत होता है. पारिस्थितिकीय निकेत को प्रभावित करने वाले कारक -

संख्या चर: संख्या का घनत्व, प्रजातियों का क्षेत्र, भोजन या आहार की आवृत्ति.

निकेत चर: स्थान की ऊँचाई, दैनिक समय की अवधि, आहार और संख्या में अनुपात.

आवास चर: उच्चावच (ऊंचाई), ढलान वाली मिट्टी, मिट्टी की उर्वरता.

पारिस्थितिकी तंत्र के घटक (Components of Ecosystem)

पारिस्थितिक-तंत्र की संरचना दो प्रकार के घटकों से होती है-


अजैविक घटक (Abiotic Components)

पारिस्थितिक तंत्र के अजैविक घटक बहुत महत्वपूर्ण हैं. अजैविक घटकों में मिट्टी, जल, वायु और प्रकाश ऊर्जा आदि शामिल हैं.

इनमें कई अकार्बनिक पदार्थ जैसे ऑक्सीजन, नाइट्रोजन आदि के साथ-साथ रासायनिक और भौतिक प्रक्रियाएं (ज्वालामुखी, भूकंप, बाढ़, जंगल की आग, जलवायु और मौसम की स्थिति) शामिल हैं.


प्रत्येक अजैविक कारक का अलग-अलग अध्ययन किया जा सकता है. लेकिन प्रत्येक कारक स्वयं अन्य कारकों से प्रभावित होता है और बदले में उन कारकों को भी प्रभावित करता है.

अजैविक कारक इस बात के महत्वपूर्ण निर्धारक हैं कि कोई जीव अपने वातावरण में कितनी अच्छी तरह रह सकता है. इसलिए इसे सीमित कारक भी कहा जाता है.

जैविक घटक (Biotic Components)

जैविक घटक में उत्पादक, उपभोक्ता तथा अपघटक शामिल हैं.


उत्पादक स्वपोषी होते हैं. जो साधारणत: क्लोरोफिल युक्त जीव होते हैं और अकार्बनिक अजैविक पदार्थों को सूर्य के प्रकाश की उपस्थिति में संचित कर अपना भोजन बनाते हैं.


जैविक घटकों को मुख्य रूप से तीन प्रकारों में विभाजित किया जा सकता है -

1- उत्पादक या स्वपोषी संघटक (Producers or Autotrophs)

इसमें हरे पौधे, कुछ जीवाणु और शैवाल शामिल हैं, जो सूर्य के प्रकाश की उपस्थिति में सरल अकार्बनिक पदार्थों से अपना भोजन बना सकते हैं. अर्थात ऐसे जीव जो अपना भोजन स्वयं बना सकते हैं. प्राथमिक उत्पादक कहलाते हैं.

2- उपभोक्ता (Consumers)

वे सभी जीव जो भोजन के लिए हरे पौधों या अन्य जीवों पर निर्भर होते हैं, उपभोक्ता कहलाते हैं. सभी उपभोक्ताओं में परपोषी गुण व्याप्त होता है. इसे मुख्यत: तीन प्रकार से विभाजित किया जा सकता है -

   A प्राथमिक उपभोक्ता

वह उपभोक्ता जो अपने भोजन के लिए हरे पौधों पर निर्भर रहता है, प्राथमिक उपभोक्ता (शाकाहारी) कहलाता है. जैसे - चरने वाले जानवर- टिड्डा, कीट, तितली, गिलहरी, पक्षी, खरगोश, हिरण, बकरी, गाय, भैंस आदि.


   B द्वितीयक उपभोक्ता

वह उपभोक्ता जो पोषण के लिये शाकभक्षी या अन्य प्राणियों पर निर्भर रहता है द्वितीयक उपभोक्ता कहलाता है. जैसे - मेंढक, सांप, बाज, गिद्ध आदि.


   C तृतीयक उपभोक्ता

इसमें वे उपभोक्ता आते हैं जो सभी प्रकार के मांसाहारी जीवों को अपना आहार बनाते हैं. जैसे- शेर, बाघ, बड़ी शार्क, बाज आदि.


3 अपघटक (Decomposer)

इसमें मुख्य रूप से बैक्टीरिया और कवक आते हैं, वे पोषण के लिए मृत कार्बनिक पदार्थ या अपरद पर निर्भर रहते हैं.


अपघटक अपने भोजन को उपभोक्ताओं की तरह निगलते नहीं हैं, बल्कि वे अपने शरीर से मृत या मृतप्राय पौधों और जानवरों के अवशेषों पर विभिन्न प्रकार के एंजाइमों का उत्सर्जन करते हैं. इन मृत अवशेषों के बाह्य श्वसनीय पाचन से सामान्य अकार्बनिक पदार्थों का उत्सर्जन होता है, जिनका अपघटकों के द्वारा उपभोग किया जाता है.

पारिस्थितिकी तंत्र से संबंधित नियम

• संपूर्ण जीवमंडल एक जटिल पारिस्थितिकी तंत्र है.

• पारिस्थितिक तंत्र पारिस्थितिकीय अध्ययन की आधारभूत इकाई है. इसमें अजैविक और जैविक दोनों घटक होते हैं.

• पारिस्थितिकी तंत्र का एक महत्वपूर्ण नियम समरूपता का नियम है. अर्थात् भौतिक और जैविक प्रक्रियाएं आज भी वैसी ही हैं जैसी वे अतीत में थीं और भविष्य में भी वैसी ही रहेंगी जैसी वे अतीत में थी. अंतर केवल उनके परिमाण, तीव्रता, आवृत्ति या दर का होता है.

• पारिस्थितिकी तंत्र सौर विकिरण के रूप में ऊर्जा के निवेश से संचालित एवं कार्यशील होता है, सौर ऊर्जा विभिन्न पोषण स्तरों में विभिन्न रूपों में प्रवाहित होती है. प्राणियों द्वारा ऊष्मा के निष्कासन के फलस्वरूप शून्य में चली जाती है. अर्थात् उसी ऊर्जा का पुनः उपयोग नहीं हो सकता है. इस प्रकार से ऊर्जा का प्रवाह एकदिशीय होता है.

• पोषी स्तरों में वृद्धि के साथ श्वसन के माध्यम से ऊर्जा की सापेक्ष हानि बढ़ जाती है अर्थात् उच्च पोषी स्तरों वाले जीवों में श्वसन द्वारा ऊष्मा की हानि अपेक्षाकृत अधिक होती है.

• बढ़ते हुए पोषी स्तरों में ऊर्जा का प्रगामी ह्रास होता है. प्रत्येक पोषी स्तर के जीव अपने पिछले पोषी स्तर के जीवों से 10 प्रतिशत ऊर्जा की ही प्राप्ति कर पाते हैं. इसे ऊर्जा स्थानांतरण के 10 प्रतिशत नियम के रूप में भी जाना जाता है.

• किसी निश्चित पोषण स्तर के जीवों और ऊर्जा के मूल स्रोतों (पौधों) के बीच की दूरी जितनी अधिक होगी उन जीवों की एक ही पोषण स्तर पर आहार के लिये निर्भरता में उतनी ही कमी होगी. यही कारण है कि खाद्य श्रृंखला छोटी है और खाद्य जाल बड़ा और जटिल है.

• पारिस्थितिकी तंत्र की उत्पादकता को प्रभावित करने वाला सबसे महत्वपूर्ण कारक सूर्यताप है. सूर्यताप में कमी पारिस्थितिकी तंत्र की उत्पादकता और जैव विविधता दोनों को कम करती है. यही कारण है कि जैसे-जैसे हम निचले अक्षांशों से उच्च अक्षांशों की ओर बढ़ते हैं पारिस्थितिक तंत्र की उत्पादकता और जैव विविधता में कमी आती है.

• पारिस्थितिक तंत्र की उत्पादकता कुछ अजैविक कारकों जैसे वर्षा की मात्रा, मिट्टी की प्रकृति, जलवायु में पोषक तत्वों की उपलब्धता और रासायनिक कारकों से प्रभावित होती हैै.

• पारिस्थितिक तंत्र की स्थिरता समस्थिति क्रियाविधि द्वारा बनाए रखी जाती है अर्थात पारिस्थितिकी तंत्र में कोई भी अवांछित परिवर्तन प्रकृति द्वारा स्वत: ही समायोजित कर लिया जाता है.

पारिस्थितिकी तंत्र के प्रकार

पारिस्थितिकी तंत्र का वर्गीकरण निम्न प्रकार से किया जा सकता है -


प्राकृतिक पारितंत्र (Natural Ecosystem)

• पूर्ण रूप से सौर विकिरण पर निर्भर, उदाहरण-  जंगल, घास के मैदान, रेगिस्तान, नदियाँ, झीलेंं. इनसे हमें भोजन, ईंधन, चारा तथा औषधियाँ प्राप्त होती हैं.

• सौर विकिरण तथा ऊर्जा सहायकों, जैसे- हवा, वर्षा और ज्वार-भाटा पर निर्भर. उदाहरण- उष्णकटिबंधीय वर्षा वन, प्रवाल भित्तियाँ.


मानव निर्मित पारितंत्र (Manmade Ecosystem)

1- सौर ऊर्जा पर निर्भर वह पारितंत्र जो मानव द्वारा निर्मित किए गए है. जैसे- खेत, एक्वाकल्चर और कृत्रिम तालाब.

2- जीवाश्म ईंधन पर निर्भर पारिस्थितिकी तंत्र जैसे- नगरीय पारितंत्र और औद्योगिक पारितंत्र.

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