पर्यावरण क्या है – परिभाषा, विशेषताएं, प्रकार, संरचना और संघटक

Sandeep
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पर्यावरण (Paryavaran)

पर्यावरण की कार्य प्रणाली प्राकृतिक संसाधनों द्वारा संचालित होती है तथा पर्यावरण के तत्वों में स्थलीय एकता का अस्तित्व होता है.

पर्यावरण हमारी पृथ्वी पर जीवन का आधार है, जो न केवल मनुष्य बल्कि विभिन्न प्रकार के जीव-जन्तुओं एवं वनस्पतियों की उत्पत्ति, विकास एवं अस्तित्व का आधार है.

सभ्यता के विकास से लेकर वर्तमान युग तक मनुष्य ने जो प्रगति की है उसमें पर्यावरण की महत्वपूर्ण भूमिका रही है.

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पर्यावरण क्या है (What is Environment In Hindi)

पर्यावरण शब्द दो शब्दों 'परी + आवरण' से मिलकर बना है, जिसमें परी का अर्थ है चारों ओर और आवरण का अर्थ है ढका हुआ अर्थात वनस्पतियों और जीवों के चारों ओर का आवरण.


अंग्रेजी भाषा में इसे Environment कहा जाता है. Environment शब्द की उत्पत्ति फ्रेंच भाषा के Environ शब्द से हुई है, जिसका अर्थ है आवृत्त या घिरा हुआ.

पर्यावरण जैविक और अजैविक घटकों का एक संयोजन है, जो जीवित प्राणियों को कई प्रकार से प्रभावित करता है. पर्यावरण के कुछ कारक संसाधनों के रूप में कार्य करते हैं जबकि अन्य कारक नियन्त्रक के रूप में कार्य करते हैं.

कुछ विद्वानों ने पर्यावरण को (Habitat or Milieu) शब्द से भी सम्बोधित किया है, जिसका अर्थ चारों ओर के वातावरण का समूह होता है.

सरल अर्थों में, पर्यावरण उन परिस्थितियों एवं दशाओं (भौतिक स्थितियों) को संदर्भित करता है जो एक जीव या जीवों के समूह को आवृत्त (Cover) करता हैं और उसे प्रभावित करता है.

पर्यावरण की मुख्य विशेषताएं (Main Features of Environment in Hindi)

पर्यावरण की प्रमुख विशेषताएं इस प्रकार हैं -

• जैविक और अजैविक तत्वों के मेल को पर्यावरण कहते हैं. 

• जैव विविधता, प्राकृतिक आवास तथा ऊर्जा किसी पर्यावरण के प्रमुख तत्व होते हैं. तथा इसमें समय तथा स्थान के साथ परिवर्तन होता रहता है.

• पर्यावरण जैविक और अजैविक पदार्थों के कार्यात्मक संबंधों पर आधारित होता है.

• पर्यावरण की कार्यप्रणाली ऊर्जा संचार पर निर्भर करती है.

• पर्यावरण अपने स्वयं के जैविक पदार्थों का उत्पादन करता है, जो अलग-अलग स्थानों पर भिन्न-भिन्न होता है. पर्यावरण आमतौर पर पारिस्थितिक संतुलन स्थापित करने की ओर अग्रसर रहता है.

• पर्यावरण एक बंद तन्त्र है. इसके अंतर्गत प्राकृतिक पर्यावरण तंत्र स्व-नियंत्रित क्रियाविधि (होमोस्टैटिक तंत्र) द्वारा नियंत्रित होता है.


पर्यावरण के प्रकार (Type of Environment in Hindi)

पर्यावरण एक जैविक एवं भौतिक संकल्पना है, इसलिए इसके अन्तर्गत केवल प्राकृतिक वातावरण को ही नहीं बल्कि इसमें मानवजनित पर्यावरण जैसे- सामाजिक व सांस्कृतिक पर्यावरण को भी शामिल किया जाता है. सामान्यत: पर्यावरण को तीन वर्गों में वर्गीकृत किया जाता है -

(i) प्राकृतिक पर्यावरण 

प्राकृतिक पर्यावरण के अन्तर्गत वे सभी जैविक एवं अजैविक तत्व सम्मिलित हैं, जो पृथ्वी पर प्राकृतिक रूप में पाये जाते हैं. इस आधार पर प्राकृतिक पर्यावरण को जैविक एवं अजैविक भागों में बांटा जाता है.

जैविक तत्वों में सूक्ष्म जीव, पौधे एवं जन्तु शामिल हैं तथा अजैविक तत्वों में ऊर्जा, उत्सर्जन, तापमान, ऊष्मा का प्रवाह, जल, वायुमंडलीय गैसें, वायु, अग्नि, गुरुत्वाकर्षण, उच्चावच एवं मृदा शामिल हैं.

(ii) मानव निर्मित पर्यावरण

मानव निर्मित पर्यावरण में वे सभी स्थान सम्मिलित हैं जो मनुष्य द्वारा कृत्रिम रूप से बनाए गए हैं. अत: कृषि क्षेत्र, औद्योगिक शहर, हवाई अड्डे, अंतरिक्ष स्टेशन आदि मानव निर्मित पर्यावरण के उदाहरण हैं.

जनसंख्या वृद्धि एवं आर्थिक विकास के कारण मानव निर्मित पर्यावरण का क्षेत्र एवं प्रभाव बढ़ रहा है.

(iii) सामाजिक पर्यावरण

सामाजिक पर्यावरण में सांस्कृतिक मूल्यों एवं मान्यताओं को सम्मिलित किया जाता है. पृथ्वी पर भाषाई, धार्मिक रीति-रिवाजों, जीवन-शैली आदि के आधार पर सांस्कृतिक पर्यावरण का निर्माण होता है.

राजनीतिक, आर्थिक और धार्मिक संस्थान या संगठन, सामाजिक पर्यावरण का हिस्सा होने के साथ-साथ यह निर्धारित करते हैं कि पर्यावरणीय संसाधनों का उपयोग कैसे और किन किन लाभों के लिए किया जाएगा.

पर्यावरण की संरचना (Environmental structure)

पृथ्वी पर पाये जाने वाले पर्यावरण की संरचना का निर्माण निम्न चार वर्गों से मिलकर होता है -


(i) स्थलमण्डल

पृथ्वी का लगभग 30% भाग स्थलमण्डल है, जो अधिकांश जीव-जन्तुओं तथा पेड़-पौधों का सार है. इसमें पठार, मृदा, खनिज, पहाड़, चट्टानें आदि शामिल हैं. 


स्थलमण्डल प्राणियों की दो तरह से सहायता करता है. एक ओर यह इन जीवों को आवास प्रदान करते हैं और दूसरी ओर जीव चाहे स्थलीय हो या जलीय, उसके लिए खनिजों का स्रोत स्थलमंडल ही होता है.

इसके दो भाग होते हैं - शैल एवं मृदा. शैल स्थलमण्डल का एक संगठित एवं प्रायः कठोर हिस्सा है. मृदा का निर्माण तब होता है जब शैलों का अपने स्थान से अपक्षयित होता है. मृदा का निर्माण मूल शैल, जलवायु, सजीवों, समय एवं स्थलाकृति के बीच परस्पर क्रिया से होता है.

(ii) जलमण्डल

जलमण्डल पर्यावरण का एक महत्वपूर्ण घटक है, क्योंकि यह पृथ्वी पर स्थलीय व जलीय जीवन को संभव बनाने वाला मुख्य कारण है, जलमंडल के अंतर्गत सतही एवं भूमिगत जल सम्मिलित हैं.


पृथ्वी पर स्थित जल कई रूपों में पाया जाता है. जैसे - महासागर, झीलें, बांध, नदियाँ, हिमनद और स्थल के नीचे स्थित भू-गार्भिक जल.

जीव अपनी विभिन्न उपापचयी प्रक्रियाओं के लिए जल का उपयोग करते हैं. इसके अलावा जीवद्रव्य (प्रोटोप्लाज्म्म) का सबसे महत्वपूर्ण घटक जल ही है.

जलमंडल पर अधिकांश जल लवणीय है, जो समुद्रों व महासागरों में स्थित है और प्रत्यक्ष रूप से मनुष्यों के लिए उपयोगी नहीं है. अलवणीय/स्वच्छ जल का भण्डारण मुख्यतः नदियों, हिमनदों तथा भूमिगत जल के रूप में मिलता है. पृथ्वी पर उपयोग के लिए उपलब्ध अलवणीय जल कुल जल की मात्रा का 1% से भी कम है.

(iii) वायुमण्डल

वायुमंडल जीवन के लिए एक महत्वपूर्ण घटक है, इसके बिना जीवन की कल्पना नहीं की जा सकती है. वायुमण्डल में विभिन्न प्रकार की गैसें पाई जाती हैं जिनमें ऑक्सीजन, नाइट्रोजन, कार्बन डाइऑक्साइड प्रमुख हैं.



वायुमण्डल (Atmosphere) को निम्नलिखित भागों में विभाजित किया जाता है -


क्षोभमण्डल

क्षोभमण्टल वायुमंडल की सबसे निचली परत होती है, जो ध्रुवों पर 8 किलोमीटर और भूमध्य रेखा पर 18 किलोमीटर की ऊँचाई तक पाई जाती है. इस क्षेत्र में तापमान गिरने की दर 165 मीटर की ऊंचाई पर 1 डिग्री सेल्सियस और किलोमीटर की ऊंचाई पर 6.4 डिग्री सेल्सियस होती है.


वायुमंडल की कुल मात्रा का 90% भाग क्षोभमंडल में पाया जाता है, तूफान, बादल, वर्षा आदि प्राकृतिक घटनाएँ क्षोभमण्डल में घटित होती हैं. स्थलीय जीव इस मंडली से संबंधित होते हैं.

इसके अन्तर्गत भारी गैसों, जलवाष्प तथा धूलकणों का अधिकतम भाग रहता है,  इस मण्डल की ऊँचाई शीतकाल की अपेक्षा ग्रीष्म ऋतु में अधिक हो जाती है. इस वृत्त की ऊपरी सीमा को क्षोभसीमा भी कहा जाता है.

समतापमण्डल

समताप मण्डल वायुमंडल में क्षोभमंडल के ऊपर पाया जाता है. भूमध्य रेखा पर इसकी ऊँचाई 18 किलोमीटर से 50 किलोमीटर तक पाई जाती है. इसी वृत्त में ओजोन परत पाई जाती है, इसलिए इसे ओजोनमण्डल भी कहते हैं.


मध्यमण्डल

मध्यमण्डल की ऊंचाई 50 से 80 किलोमीटर तक होती है और इस मण्डल में तापमान में अचानक गिरावट आते रहती है, मध्यमण्डल में ऊंचाई के साथ तापमान में ह्रास होता जाता है. इसकी ऊपरी सीमा -90°C द्वारा निर्धारित होती है, जिसे मेसोपॉज कहा जाता है.


तापमण्डल

मध्यमण्डल (80 किलोमीटर) के ऊपर वायुमंडलीय भाग (अनिश्चित ऊंचाई तक) को तापमण्डल (थर्मोस्फीयर) कहा जाता है, इसमें ऊंचाई के साथ तापमान तेजी से बढ़ता है. 


इस मण्डल में उच्च तापमान के बावजूद गर्मी महसूस नहीं होती है क्योंकि इस ऊंचाई पर गैसें अत्यधिक बिखरी हुई हो जाती हैं और बहुत कम ऊष्मा बरकरार रहती है. तापमण्डल के दो भाग हैं जो निम्नवत हैं -

1. आयनमण्डल - मध्यमण्डल के ऊपर 80 से 640 किलोमीटर तक फैला हुआ होता है, इसमें विद्युत आवेशित कणों की अधिकता होती है. इस भाग में विस्मयकारी विद्युतीय व चुंबकीय घटनाएं घटित होती हैं तथा ब्रह्मांडीय किरणों का परावर्तन होता है.

रेडियो तरंगें इस क्षेत्र से परावर्तित होती हैं और संचार को संभव बनाती हैं, यदि यह मण्डल ना होता तो रेडियो तरंगें धरातल पर न आतीं और आकाश में असीमित ऊँचाई पर चली जातीं. आयनमंडल तापमण्डल का सबसे निचला हिस्सा है.

2. बाह्यमण्डल - बाह्यमण्डल का विस्तार 640 किलोमीटर से ऊपर होता है. इस मण्डल के बाद वायुमंडल अंतरिक्ष में विलीन हो जाता हैै.

(iv) जैवमण्डल

जीवमंडल पृथ्वी का वह भाग है जहां जीवन संभव है.  इसके अन्तर्गत निम्नतर वायुमण्डल, स्थलमण्डल एवं जलमण्डल सम्मिलित हैं जहां सजीव पाये जाते हैं अर्थात् जीवमण्डल ऐसा क्षेत्र होता है जहां वायुमण्डल, स्थलमण्डल एवं जलमण्डल मिलते हैं.


जैवमण्डल में समुद्र तल से 200 मीटर नीचे और 6000 मीटर की ऊंचाई तक जीवन संभव है. उत्तरी और दक्षिणी ध्रुवों तथा ऊंचे पहाड़ों और गहरे समुद्रों में पाई जाने वाली विषम जलवायु जीवन को संभव नहीं होने देती है. इसलिए इन क्षेत्रों में जीवमंडल अनुपस्थित होता है.

जैवमण्डल में सूर्य से प्राप्त ऊर्जा जीवन को संभव बनाती है, जबकि जीवों के पोषक तत्वों की आपूर्ति हवा, पानी और मृदा से होती है. 

जैवमण्डल में जीवों का वितरण एक समान नहीं है, क्योंकि ध्रुवीय क्षेत्रों में कुछ ही जीव पाए जाते हैं, जबकि विषुवतीय वर्षा वनों में बड़ी संख्या में जीव प्रजातियां पाई जाती हैं.

पर्यावरण के संघटक (Components of The Environment in Hindi)

पर्यावरण अनेक तत्वों का समूह है और इसमें प्रत्येक तत्व का महत्वपूर्ण स्थान है, प्राकृतिक पर्यावरण के तत्व भी पारिस्थितिकी के तत्व हैं क्योंकि पर्यावरण पारिस्थितिकी के मूल घटकों में से एक है. सामान्य स्तर पर, पर्यावरण के तत्वों को निम्न दो समूहों में वर्गीकृत किया जाता है -


1. जैविक घटक

पर्यावरण के जैविक घटकों के अन्तर्गत पादप, जीव (मनुष्य, पशु, परजीवी, सूक्ष्मजीव आदि) तथा अपघटक सम्मिलित हैं, पारिस्थितिक तंत्र के जैविक घटक अजैविक पृष्ठभूमि में परस्पर क्रिया करते हैं.


इसमें प्राथमिक उत्पादक (स्वपोषी) और उपभोक्ता (परपोषी) शामिल होते हैं.

प्राथमिक उत्पादक

प्राथमिक उत्पादक जीव, मूल रूप से हरे पौधे, कुछ बैक्टीरिया एवं शैवाल जो सूर्य के प्रकाश की उपस्थिति में सरल अकार्बनिक पदार्थों से अपना भोजन बना सकते हैं, उन्हें ऑटोट्रॉफ़्स या प्राथमिक उत्पादक कहा जाता है.


उपभोक्ता

उपभोक्ता वे जीव जो अपना भोजन स्वयं नहीं बना सकते और अपना भोजन अन्य जीवों से प्राप्त करते हैं, परपोषी या उपभोक्ता कहलाते हैं, इनमें फिर से तीन उपवर्ग हैं.


प्राथमिक उपभोक्ता - ये शाकाहारी जंतु होते हैं.

द्वितीयक उपभोक्ता - ये मांसाहारी जंतु होते हैं.

तृतीयक उपभोक्ता या सर्वाहारी - इसके अंतर्गत मुख्य रूप से मनुष्य आते हैं, क्योंकि यह शाकाहारी और मांसाहारी दोनों को खाता है.


वियोजक या अपघटक

अपघटक सूक्ष्म जीव होते हैं, जो मृत पौधों, जंतुओं और कार्बनिक पदार्थों का अपघटन करते हैं.


इस प्रक्रिया के दौरान ये अपने भोजन का निर्माण भी करते हैं तथा जटिल कार्बनिक पदार्थों को एक दूसरे से अलग करते हैं और उन्हें सामान्य बनाते हैं, जो स्वपोषी, प्राथमिक उत्पादक हरे पौधों द्वारा पुन: उपयोग किए जाते हैं. इनमें से अधिकांश जीव मिट्टी में सूक्ष्म जीवाणु और कवक के रूप में रहते हैं.

2. अजैविक घटक

पर्यावरण के अजैविक घटकों में प्रकाश, वर्षा, तापमान, आर्द्रता और जल, अक्षांश, ऊँचाई, उच्चावच आदि शामिल होते हैं, पर्यावरण के प्रमुख अजैविक घटक इस प्रकार हैं -


प्रकाश - हरे पौधों के लिए प्रकाश आवश्यक है, जिससे वे प्रकाश संश्लेषण करते हैं, हरे पौधों द्वारा उत्पादित भोजन पर सभी जीवित प्राणी प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से निर्भर होते हैं.  सूर्य से आने वाला प्रकाश (सौर ऊर्जा) सभी जीवों के लिए ऊर्जा का परम स्रोत है.

वर्षण - कोहरा बारिश, बर्फ या ओलों के सबसे महत्वपूर्ण अजैविक कारकों में से एक है, अधिकांश जीवित प्राणी किसी न किसी रूप में वर्षा पर प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से निर्भर हैं, जो अधोभमि से होता है. वर्षा की मात्रा इस बात पर निर्भर करती है कि आप पृथ्वी पर कहां हैं.

तापमान - यह पर्यावरण का एक महत्वपूर्ण घटक है. जो जीवों के अस्तित्व को काफी हद तक प्रभावित करता है, जीव अपने विकास के लिए तापमान की एक निश्चित सीमा को ही सहन कर सकते हैं, उस सीमा से कम या अधिक तापमान होने पर जीवों की वृद्धि रुक ​​जाती है.

आर्द्रता एवं जल - कई पौधों और जानवरों के लिए हवा में नमी होना जरूरी है जिससे वे सही से कार्य कर सकें. कुछ प्राणी केवल रात में अधिक सक्रिय होते हैं, जब आर्द्रता अधिक होती है, जलीय आवास पर रसायनों तथा गैसों की मात्रा में होने वाले परिवर्तनों का तथा गहराई में अंतर आने का प्रभाव पड़ता है.

अक्षांश - जैसे-जैसे हम भूमध्य रेखा से उत्तर या दक्षिण की ओर बढ़ते हैं वैसे-वैसे सूर्य का कोण सामान्यत: छोटा होता जाता है जिससे औसत तापमान गिरता जाता है.

ऊंचाई - अलग-अलग ऊंचाई पर वर्षा और तापमान दोनों में भिन्नता पाई जाती है, आमतौर पर ऊंचाई के साथ वर्षा बढ़ती है. लेकिन अत्यधिक ऊंचाई पर वर्षा घट सकती है.

उच्चावच - भूमि का आकार या उच्चावच पर्यावरण का एक अत्यंत महत्वपूर्ण तत्व है, पूरी पृथ्वी की सतह या स्थलाकृति विविधता से भरी है, इस विविधता को महाद्वीपीय स्तर से लेकर स्थानीय स्तर तक देखा जा सकता है. सामान्यतः उच्चावच के तीन रूप - पहाड़, पठार और मैदान होते हैं.

पर्वत एवं मैदान में विस्तार, ऊंचाई, संरचना आदि की क्षेत्रीय विविधता होती है तथा कटाव और अपक्षय गतिविधियों के कारण अनेक भू-रूपों या स्थलाकृतियों का जन्म होता है.

उदाहरणतः कहीं रेगिस्तानी स्थलाकृति है तो कहीं चूना प्रदेश है और यदि एक ओर हिमाच्छादित है तो दूसरी ओर नदियों द्वारा निर्मित समतल डेल्टा क्षेत्र है.

पर्यावरणीय अध्ययन (Environment Study)

पर्यावरण के अध्ययन को पर्यावरणीय अध्ययन कहा जाता है, पर्यावरण अध्ययन एक ऐसा क्षेत्र है जिसमें अध्ययन की कई शाखाएं शामिल हैं जैसे रसायन विज्ञान, भौतिकी, चिकित्सा, जीव विज्ञान, कृषि, सार्वजनिक स्वास्थ्य आदि.

पर्यावरणीय अध्ययन के कारण (Reasons for Environmental Studies)

पर्यावरणीय अध्ययन निम्न कारणों से महत्वपूर्ण हैं -

पर्यावरण में जीवन के हर रूप चाहे वह छोटा हो या बड़ा उसकी अपनी महत्वपूर्ण भूमिका है. अतः पृथ्वी पर मानव जीवन के अस्तित्व को बनाए रखने के लिए यह आवश्यक है कि जैव-विविधता को संरक्षित किया जाए, इसके लिए पर्यावरण का अध्ययन आवश्यक है.

प्रकृति की संरचना विशिष्ट है और इसकी हर क्रिया और कार्य का एक निश्चित उद्देश्य होता है, कभी वह मानव जीवन को प्रत्यक्ष तो कभी परोक्ष रूप से प्रभावित करती है और इसमें जरा सा भी परिवर्तन मानव जीवन पर बड़ा परिवर्तन ला सकता है, इस लिए पर्यावरण संरचना का ज्ञान अति आवश्यक है.

जनसंख्या और संसाधनों के बीच इष्टतम संबंध स्थापित करने के लिए पर्यावरण का अध्ययन आवश्यक है. पर्यावरण के अध्ययन के माध्यम से पर्यावरण जागरूकता फैलाकर सतत विकास और आर्थिक प्रगति को बढ़ाया जा सकता है.

पर्यावरण अध्ययन के विषय क्षेत्र

वर्तमान समय में पर्यावरण के सम्बन्ध में निम्नलिखित विषयों का विशेष अध्ययन किया जा रहा है -

• मनुष्य द्वारा पर्यावरण में तापमान वृद्धि और वातावरण में तापमान में वृद्धि और जलवायु परिवर्तन.

• महानगरों और अन्य स्थानों में ओजोन परत का क्षरण और वायु प्रदूषण.

• प्राकृतिक आपदाओं और वनों के विनाश का अध्ययन.

• जैविक विविधता का ह्रास.

• संसाधनों का उपयोग और उनका संरक्षण.

• प्राकृतिक संसाधनों का लेखा-जोखा तैयार करना और जैविक विविधता के लाभों को समाज के सभी वर्गों तक पहुँचाना.


मानव एवं पर्यावरण

भूगोल में प्रायः मानव तथा पर्यावरण के पारस्परिक सम्बन्धों का अध्ययन किया जाता है. प्रसिद्ध अमेरिकी भूगोलवेत्ता एलेन सी-सेम्पल के अनुसार, मनुष्य अपने पर्यावरण की उत्त्पति है.

भूगोलवेत्ताओं द्वारा मानव एवं पर्यावरण के सम्बन्ध में अनेक विचारधाराओं/अवधारणाओं का प्रतिपादन किया गया है, जो इस प्रकार हैं-

• निश्चयवादी या नियतिवाद - प्रसिद्ध वैज्ञानिक चार्ल्स डार्विन के अनुसार मनुष्य अपने पर्यावरण से संघर्ष करके वर्तमान स्वरूप में पहुँचा है.

भूगोल में डार्विन के संघर्ष सिद्धांत का उल्लेख पहली बार रेटाजिल ने अपनी प्रसिद्ध पुस्तक एंथ्रोपोगोग्राफी में किया था. रेटाजिल ने मनुष्य और पर्यावरण के संबंध में नियतत्ववाद विचारधारा को जन्म दिया.

• संभावनावाद - भूगोलवेत्ताओं का मानना ​​है कि मनुष्य अपनी आवश्यकता के अनुसार पर्यावरण में परिवर्तन करने में सक्षम है इसलिए वे मानव को अधिक महत्व देते हैं, इस महान विचारधारा के प्रवर्तक विडाल-डी-लब्लश हैंं.

• नव निश्चयवाद - वर्तमान में इन दोनों विचारधाराओं से पृथक होकर नव निश्चयवाद को अधिक महत्व दिया जा रहा है, जो मानव और पर्यावरण के बीच संतुलन को महत्व देकर सतत विकास का आधार बनाता है. नव निश्चयवाद को (रूको और जाओ) नियतिवाद भी कहा जाता है. इस विचारधारा के जनक ग्रिफिथ टेलर हैंं.

मानव पर पर्यावरण का प्रभाव

दुनियां की शहरी आबादी प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से भौतिक पर्यावरण से प्रभावित होती है. पर्यावरण के भौतिक तत्व में जलवायु का मानव समाज और उनकी जीवन शैली पर सबसे अधिक प्रभाव पड़ता है.

इसके अंतर्गत मध्य एशियाई क्षेत्रों तथा अफ्रीका एवं अन्य विषम जलवायु वाले क्षेत्रों का वातावरण वहाँ रहने वाले लोगों के जीवन को स्पष्ट रूप से प्रभावित करता है.

उदाहरणतः- मध्य एशियाई क्षेत्रों के लोग पशुपालन तथा कालाहारी एवं कांगो घाटियों के लोग शिकार करके और ध्रुवीय क्षेत्रों के लोग पारंपरिक कृषि और बर्फ के घरों (इग्लू) में रहने और वहां पाए जाने वाले जीवों पर निर्भर रहते हैं. 

इसके अलावा, जलवायु का सीधा प्रभाव प्रजातियों के रंग, आंख, नाक, शरीर की बनावट, बाल, ठुड्डी, खोपड़ी और चेहरे के आकार पर पड़ता हैै.

पर्यावरण पर मानव का प्रभाव

पर्यावरण पर मानव प्रभाव को दो प्रमुख श्रेणियों में विभाजित किया जा सकता है, जो इस प्रकार है -

प्रत्यक्ष प्रभाव
प्रत्यक्ष प्रभाव के अंतर्गत नियोजित तथा निर्धारित प्रकार के प्रभाव शामिल होते हैं, क्योंकि मनुष्य अपने कार्यों के परिणामों से अवगत रहता है.

उदाहरण- भूमि उपयोग में परिवर्तन, नाभिकीय कार्यक्रम, मौसम रूपान्तर कार्यक्रम, निर्माण तथा उत्खनन आदि. प्रत्यक्ष प्रभाव अल्पावधि में परिलक्षित होते हैं तथा दीर्घावधि में पर्यावरण को प्रभावित करते रहते हैं साथ ही यह परिवर्तनीय भी होते हैं.

अप्रत्यक्ष प्रभाव
इसके अंतर्गत वे प्रभाव आते हैं जिनके बारे में पहले से सोचा या नियोजित नहीं किया जाता है.

उदाहरण- औद्योगिक विकास के लिए किए गए कार्यों के प्रभाव तुरंत परिलक्षित नहीं होते हैं.

इनमें से अधिकांश प्रदूषण तथा पर्यावरण क्षरण से संबंधित होते हैं, ये Ecosystem में ऐसे बदलाव लाते हैं जो इंसानों के लिए घातक होते हैं.

FAQ Section: Paryavaran Kya hai हिंदी में

प्रश्न - पर्यावरण किसे कहते हैं?
उत्तर - जो कुछ भी हमारे आसपास मौजूद है तथा हमारे रहने की स्थिति और मानसिक क्षमताओं को प्रभावित करता है उसे पर्यावरण कहा जाता है.

प्रश्न - पर्यावरण का महत्व क्या है?
उत्तर - मनुष्य पर्यावरण के बिना एक क्षण भी जीवित नहीं रह सकता है, हरे-भरे पेड़-पौधे हमारे जीवन का अभिन्न अंग हैं. प्रकृति के बिना मानव जीवन की कल्पना भी नहीं की जा सकती है. जल, थल, वायु, अग्नि, आकाश इन्हीं पांच तत्वों से ही मनुष्य का जीवन है और जीवन के अंत के बाद वह इन्हीं में विलीन हो जाता है.

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निष्कर्ष: पर्यावरण क्या है?

पर्यावरण हमें जीवन देता है अर्थात पर्यावरण के बिना हमारा कोई अस्तित्व नहीं. फिर भी हम पर्यावरण को क्षति ही पहुंचाते हैंं. Paryavaran kya Hai से संबंधित आपने जो कुछ जाना, उसे परिवार और दोस्तों के साथ साझा करें. विद्यार्थीयों को प्रोत्साहित करें कि वे इस महत्त्वपूर्ण जानकारी को अवश्य बाँटें.

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